प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि मैं सदा जीता रहूँ, कभी भी न मरूँ, मैं सब कुछ जानने वाला हो जाऊँ और कभी भी अज्ञानी न रहूँ, मैं सदा सुखी रहूँ और मैं कभी दुखी न रहूँ, परंतु मनुष्य की यह चाहत अपने बल से अथवा संसार से कभी भी पूरा नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य जो चाहता है वह संसार के पास है ही नहीं। वास्तव में मनुष्य को जो चाहिए वह उसके पहले से ही प्राप्त होता है।
उससे गलतियाँ होती हैं कि वह उन वस्तुओं को चाहने लगता है जिनका संयोग और वियोग होता है और जो मिलने और बिछड़ने वाली होती है।मतलब ब्यक्ति संसार में उलझ जाता है और आत्मज्ञान की सोचता ही नहीं ,या बहुत काम ही सोच पता है।
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